Saturday, August 20, 2016

Our unhealthy GDP (an article in Hindi)


चकित न हों - मुझे पता है भारत की जीडीपी वृद्धि दर विश्व में फिलहाल सर्वाधिक है (चीन से भी अधिक) और अनेक अंतर्राष्ट्रीय निकाय हमें शाबाशी दे रहे हैं. हमारे आर्थिक सर्वेक्षण 2016 एवं बजट 2016-17 में भी इस आधार पर अनेक योजनागत विश्लेषण व अनुमान लगाये गए हैं. अच्छा है, जीडीपी का परिमाण बढ़ना ही चाहिए अन्यथा हर साल सुरसा के मुंह की भांति बढ़ रही हमारी आबादी खपेगी कहाँ, नौकरियां आएँगी कहाँ से और प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी कैसे. ये सब तो ठीक है, किन्तु हमारी पूरी व्यवस्था 5  ऐसी बीमारियों से ग्रसित हो गई है जिनका इलाज नहीं हुआ तो वृद्धि के लाभ केवल कागज़ों पर रह जायेंगे.

प्रसिद्ध चिंतक प्रोफेसर एंगस मेडिसन ने अपने अध्ययन से ये सिद्ध किया कि ऐतिहासिक रूप से भारत और चीन विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देश रहे हैं. इन दोनों का जीडीपी विश्व के कुल का साठ प्रतिशत से अधिक हुआ करता था. प्रसिद्ध पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने इस चित्र के ज़रिये इस सच्चाई को बताया -

Angus Madisson, The Economist, India, China, GDP, Economy
विश्व इतिहास का अदभुत सच 






















किन्तु जैसा हम जानते हैं, और जी रहे हैं, आज की स्थिति बिलकुल उलट है.

वर्तमान में जीडीपी को लेकर, मेरा मानना है कि हम जितना कर सकते हैं उसका फिलहाल आधा भी नहीं कर रहे हैं, क्योंकि कुछ बड़ी समस्याएं हैं.

ये पांच मूल, ढांचागत समस्याएं हैं - अनुत्पादक व्यवस्था व प्रक्रियाएं, दिशाहीन शिक्षा प्रणाली, न्यून महिला श्रम भागीदारी, बड़ी जनसँख्या का कृषि में फंसा होना, और विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) नामक बस का छूट जाना.

पहली, और सबसे बड़ी समस्या है उत्पादकता की चर्चा का राष्ट्रीय विमर्श से पूर्णतः गायब होना. हम बातें करते हैं नौकरियों की संख्या की, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्पादन क्षमता पर कोई चर्चा ही नहीं होती है. चूंकि ये एक भावनात्मक विषय नहीं है, बल्कि तकनीकी विषय है. यदि प्रति व्यक्ति उत्पादक क्षमता पर राष्ट्रीय चर्चा शुरू हो जाये तो क्या होगा? हमें पता चलने लगेगा की बहुत सारे क्षेत्रों में हम इष्टतम निष्पादन नहीं कर रहे हैं. जो तनख्वाह दी जा रही है और जो आउटपुट मिल रहा है, उसका भीषण अंतर अचानक लेंस के नीचे आ जायेगा (ये बात सरकारी क्षेत्र पर भी लागू होगी). इसी विषय को अर्थशास्त्री "टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी" कहते हैं, जिसका एक आसान अर्थ है कि 1 + 1  = 3. इस जादू को जापान ने 1960-70 तक प्राप्त कर लिया था और एशियाई चीतों (मलेशिया, इंडोनेशिया आदि) ने 1990 तक.

दूसरा - प्रतिष्ठित सर्वेक्षणों को वर्ष-दर-वर्ष पढ़ें तो एक बात साफ़ हो जाती है - हमारे 80 से 90 प्रतिशत युवा स्कूल और कॉलेज की पूरी शिक्षा लेने का बाद जैसे ही बहार निकलते हैं और नौकरी की तलाश प्रारम्भ करते हैं, तो उन्हें पता चलता है की अभी एक लम्बी दूरी उन्हें तय करना बाकी है यदि अपने पैर ठोस रूप से ज़माने हैं तो. फिर शुरू होता है अनेक वर्षों का प्रतियोगी परीक्षाओं या इंटरव्यू का एक चक्र और 4 , 5  या 6  वर्ष बीतने के बाद छात्र कहीं जाकर टिकता है.  तक तक उसकी उम्र 28 या 30 हो चुकी होती है, अर्थात सबसे उत्पादक वर्ष ख़त्म. जब उस युवा को कमरतोड़ मेहनत कर देश के जीडीपी में अपना योगदान करना चाहिए था, तब या तो वह घर पर बैठ कर किसी परीक्षा की तैयारी कर रहा था या सिर्फ भटक रहा था या अपनी डिग्रियों से उलट कोई अलग ही अनुत्पादक कार्य कर रहा था.  क्या स्कूल और कॉलेज इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं? तो उनका काम है क्या? बस परीक्षाएं लेते जाना और सर्टिफिकेट बांटते रहना? क्या उनकी  "आउटकम-बेस्ड"  ज़िम्मेदारी नहीं बाँधी जा सकती?

तीसरा - लड़कियों और महिलाओं की हालत तो और भी बुरी - ज़्यादातर परिवार चाहते ही नहीं के लडकिया काम करें! एक सर्वे के भयानक नतीजे बताते हैं कि केवल १५ से २० % महिला मेडिकल डिग्रीधारी डॉक्टर्स वास्तव में कार्यरत हैं - इसे कहते हैं अखंड राष्ट्रीय वेस्टेज! पूरे दक्षिण एशिया में भारत में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत सबसे काम हैं, और हाँ, महिला सांसदों का प्रतिशत भी (पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की संसदों में हमसे ज्यादा है!).  इस शर्मनाक स्थिति से हमारा न केवल विश्व स्तर पर नाम ख़राब होता है, बल्कि हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा केवल घरेलू काम करता है जिसकी तो जीडीपी में गिनती ही नहीं होती है. यदि सरल शब्दों में कहें तो भारत में एक सम्पूर्र्ण लिंगभेद समाप्ति क्रांति की घोर आवश्यकता आ चुकी है। लेकिन किसी भी पार्टी के लिए ये एक गम्भीर मुद्दा है ही नहीं.

चौथे नंबर पर - देश की 50 - 60 प्रतिशत आबादी का कृषि में फंसा होना. किसान अन्नदाता है वो तो ठीक है, किन्तु क्या हमें 130  करोड़ की आबादी के लिए 70 करोड़ अन्नदाता चाहियें? अमेरिका में केवल 3 प्रतिशत आबादी किसानी करती है और 33 करोड़ लोगों का पेट भरती है. हम 1947 के बाद न तो विनोबा भावे के क्रन्तिकारी भूदान आंदोलन को अंजाम तक ले जा पाये, न कानूनी रूप से भूमि सुधार कर पाये. हर पीढ़ी के साथ जमीनें कटती चली गईं, प्रति एकड़ उत्पादकता बिगड़ती गयी और गरीबी बढ़ती गयी. किसान राजनीतिक उल्लू साधने का वो हथियार बन गया जिसका हर किसी ने पूरा दोहन किया. हाँ, बढ़िया उत्पादन देने वाले क्षेत्र और किसानों ने कमाल किया भी है, किन्तु अब समय आ गया है इनमें से ज़्यादातर को अन्य क्षेत्रों में अवसर दिलाने का.

अन्त में - हमसे सबसे बड़ी भूल हुई कि न तो हम आबादी की बढ़त रोक पाये, और न ही मैन्युफैक्चरिंग बड़े स्तर पर ला पाये. विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) को बड़े स्तर पर लाने का अर्थ है हमारी व्यवस्था को संपूर्ण रूप से पुनर्परिभाषित करना. प्रक्रियाओं को बेहद सरल बनाना. नौकरशाही समाप्त करना. अब मैन्युफैक्चरिंग पूरी तरह से मशीनीकृत हो चुकी है. कोई भी प्रमोटर 10,000 कामगारों को रखने के बजाय पूर्णतः स्वचालित फैक्ट्री लगाना पसंद करेगा जिसे केवल 50 या 100 कुशल कर्मचारी चला लें. तो हम कैसे हमारी बेरोज़गार फ़ौज़ को नियोजित कर पाएंगे? मेक इन इंडिया को शुभकामनाएं क्योंकि उसकी सफलता से करोड़ों युवाओं को रोज़गार मिल सकेगा.

कौन है जिम्मेदार इस स्थिति के लिए? उत्तर सरल है - 1947 के बाद वह हर भारतीय जिसने कोई सरकारी नीति-निर्माता का पद सम्भाला, वो हर टीचर जिसने केवल विषय पढ़ाये बच्चों को आज की जरूरतें नहीं बताईं, वह हर पलक जिसने कौशल-विकास की जगह डिग्री पर बल दिया, अर्थात, हम सब.
मेरा मानना है कि देश में आज इन मुद्दों पर गंभीर, व्यापक और सतत बहस की आवश्यकता है. हमारे आपसी मतभेद यदि हमें इन मूल समस्याओं का समाधान करने के बजाय कहीं और ले गए, तो शायद हमें बड़ा लम्बा इंतज़ार अगले जनसांख्यिकीय लाभांश के लौटने का करना पड़ेगा! 
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5 comments:

vinay goyal said...

GDP is increasing but without developing industries and manufacturing sector it is always unstable. to make it stable work on those 5 factors effectively and basically on education system. education is directly or indirectly related with all other factors.

Anonymous said...

सर आप हिंदी में ज़रूर लिखा करें अपने ब्लॉग पर । धन्यवाद सर आपका फैन हूँ मै पिछले दो वर्षों से । आप वास्तव में गुरु हैं। सर जिस तरह किसान का फायदा उठाया गया वैसे ही गरीबी और गरीब का भी।
सर आपको और आप जैसे कई अध्यापकों लेखकों को लोग पढ़ते या सुनते ज़रूर हैं बस लाइक या कमेंट नहीं करते पता नहीं क्यों , जैसे कि मैं खुद कितने दिनों बाद आज पहली बार कमेंट कर रहा हूँ ऐसा क्यों है सर?
और दूसरी बात कि कितना भी लोगों को बताइये लोग अच्छे अध्यापक या लेख़क को सुनते और पढ़ते ही नहीं या शायद केवल मैं ऐसे तीन चार सौ लोगो से घिरा हो सकता हूँ???!!!

Saloni Bhandari said...

India's GDP growth rate has been forecasted at 7.5% for the year 2016-17. But if we talk to the grass root level worker, he would say that he has not been affected by the overall growth in the economy. The growth has not reached to the last mile. Also the inequality gap is increasing day by day and is higher than ever. If we look into the problems as sir said these are:
1. Low Total Factor Productivity
2. Lack of outcome based education system.
3. Negligible women participation
4. Large population engaged in agriculture
5. Automation of manufacturing.
What is needed is to debate on these issues, make deliberations and shift the focus of govt. to these issues as well.

AMOD KUMAR said...

I Think traditional Society is responsible for not letting women work in Most parts of india.I had seen in Northeastern states where things are somewhat different from rest of india, there % of women working in town and cities are much more then rest of india.
And colleges in here are merely creating educated Fools ,Companies hiring students have to train them for year to take work from them,there isnt any mutual connection bw companies and educational institutions.
Talking about the creation of jobs ,there is only one way to give jobs to more and more people and that is by providing more and more Entrepreneur so that Jobs creation transfer in the hands of public itself because govt Services is limited and govt cannot create Manufacturing industries overnight.

Narayan Harjani said...

Sir,
This article depicts the harsh reality of problems of India.
The 'per person productivity' is something which will show the mirror of loose /tight policies of govt.The factors of "Total factor Production" are land,labour,capital and enterpreneurship. And unfortunately,synchronizing these factors to produce something is very tough in India.Our economic survey says that our India turns into "MARKETISM WITHOUT EXIT"

The reality of education is very sad but it is true.This sector needs to be revolutionised from ground zero. The structure of atleast higher education needs to be reorganised otherwise, our energetic workforce would not become as much productive as it should be. Skill India programme is the initiative but still a long way to go.

The result of lackness of education rise to this stage the women are facing. Things are changing but the pace is not yet fast.

Our population is a huge advantage. But we are unable to make our population productive. 65% of population is engaged in agriculture sector which itself is not a sector of benefit instead, govt. have to give subsidies.

Who is responsible for this condition?
Cant blame to any single person or institution. The carelessness of every responsible person of India who could have change this, but never tried.All the
Intellectual genius who use their wits just to seek political benefit instead of thinking about national benefit.